शोध के क्षेत्र

संस्थान के संगम-ज्ञापन के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों में शोध का मार्गदर्शन किया है जो इस प्रकार हैः-

  1. शोध के क्षेत्र ऐसे होने चाहिए जो अंतर्विधात्मक अनुसंधान का उन्नयन करें।
  2. अनुसंधान की विषय-वस्तु गहन मानवीय महत्व की होनी चाहिए।
  3. शोध की विषय-वस्तु उनसे संबंधित होनी चाहिए जिन्हें मूलभूत सुविधाओं की आवश्यकता हो मगर ज्यादा महंगी भी न हो।
  4. शोध मुख्यतः उन क्षेत्रों में होना चाहिए जिनमें प्रख्यात विद्वानों को आकर्षित किया जा सके। इसका एक उद्देश्य अंतर्विद्यात्मक अनुसंधान के लिए प्रणाली संबंधी रूपरेखा का विकास करना तथा दूसरा उत्पादन के स्तर की ग्रहणीयता सुनिश्चित करना है ताकि भविष्य में अधिक क्षेत्रों में ऐसे प्रयत्नों को प्रोत्साहित किया जा सके। शोध परियोजनाओं के चयन के समय राष्ट्रीय महत्व के क्षेत्रों की ओर ध्यान देना चाहिए। जब भी संभव हो विषय-वस्तु के निर्धारण में सरकारी विभागों,  शोध संस्थानों आदि से उचित विचार-विमर्श करना चाहिए। जैसे भी प्रत्येक शोध परियोजना के निश्चित समय सीमा होनी चाहिए तथा किन्हीं भी परिस्थितियों में परियोजना की समयावधि नहीं बढ़ाई जानी चाहिए। परिणामस्वरूप इन शोध परियोजनाओं के पूर्ण होने पर उनका प्रकाशन किया जाना चाहिए।

अध्ययन के क्षेत्र

(क) सामाजिक राजनैतिक और आर्थिक दर्शन,

(ख) तुलनात्मक भारतीय साहित्य (जिसमें प्राचीन मध्यकालीन, आधुनिक, लोक और  

    आदिवासी-साहित्य भी हो),

(ग) दर्शन और धर्म का तुलनात्मक अध्ययन,

(घ) शिक्षा, संस्कृति और कला,  जिसमें निष्पादन कलाएँ और हस्तशिल्प भी हों,

(ड) तर्क और गणित की मौलिक अवधारणाएँ और समस्याएँ

(च) प्राकृतिक और सामाजिक (जीवन) विज्ञानों की मौलिक अवधारणाएँ और समस्याएँ,

(छ) प्राकृतिक और सामाजिक पर्यावरण का अध्ययन,

(ज) एशियाई पड़़ोसियों के संदर्भ में भारतीय सभ्यता, और

(झ) राष्ट्रीय एकता और राष्ट्र निर्माण के संदर्भ में समसामायिक भारत की समस्याएँ।

विषय

(क) अनेकता में भारतीय एकता का विषय; 

(ख) भारतीय चेतना की अनिवार्यता;

(ग) भारतीय प्ररिप्रेक्ष्य में शिक्षा का दर्शन;

(घ) प्राकृतिक विज्ञानों में उच्च अवधारणाएँ और उनकी दार्शनिक आशय;

(ड) विज्ञान और अध्यात्म के संश्लेषण में भारत और एशिया का योगदान,

(च) भारतीय मानव एकता,

(छ) भारतीय साहित्य एक परिचय,

(ज) भारतीय महाकाव्यों का तुलनात्मक अध्ययन,

(झ) मानव पर्यावरण।